पटना। पूर्वी चंपारण जिले के मननपुर (नवादा) गांव की रहने वाली अंजलि कुमारी ने कठिन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया। गांव के स्कूलों में पढ़ाई करते हुए उन्होंने स्नातक तक की शिक्षा अपने ही जिले से पूरी की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बिना किसी कोचिंग के केवल सेल्फ स्टडी के दम पर 70वीं बीपीएससी में सफलता हासिल की और ग्रामीण विकास पदाधिकारी (Rural Development Officer-RDO/BDO) के पद पर अंतिम चयन प्राप्त किया।
अंजलि के जीवन का सबसे कठिन दौर वर्ष 2018 में आया। उस समय वह 12वीं कक्षा की छात्रा थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। पिता परिवार की आजीविका का एकमात्र सहारा थे। उनके जाने के बाद परिवार आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से घिर गया। हालात ऐसे हो गए कि परिवार के लिए रोजमर्रा का खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया और पढ़ाई जारी रखना एक बड़ी चुनौती बन गया। इन मुश्किल परिस्थितियों में अंजलि की मां ने उनका हौसला कभी टूटने नहीं दिया। वह हमेशा चाहती थीं कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बने। पिता के निधन के बाद वह लगभग एक वर्ष तक अवसाद (डिप्रेशन) से भी जूझती रहीं, लेकिन उन्होंने बेटी की पढ़ाई किसी भी कीमत पर नहीं रुकने दी।
अंजलि की पढ़ाई जारी रखने में उनके नानाजी ने भी अहम भूमिका निभाई। उनके सहयोग से अंजलि ने वर्ष 2022 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। स्नातक के दौरान ही उन्होंने तय कर लिया था कि उनका लक्ष्य बीपीएससी की परीक्षा पास करना है।
परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए ASI में नौकरी, फिर भी नहीं छोड़ी तैयारी
स्नातक के बाद वर्ष 2023 में परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को देखते हुए अंजलि ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) में नौकरी जॉइन की। नौकरी का उद्देश्य परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में सहयोग करना था। सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक ड्यूटी करने के बाद भी उन्होंने बीपीएससी की तैयारी जारी रखी। नौकरी और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया।
पहले प्रयास में इंटरव्यू तक पहुंचीं, दूसरे प्रयास में मिली सफलता
अंजलि ने पूरी तैयारी बिना किसी कोचिंग संस्थान के केवल सेल्फ स्टडी के माध्यम से की। 68वीं बीपीएससी उनका पहला प्रयास था। पहले ही प्रयास में उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) और मुख्य परीक्षा (Mains) पास कर इंटरव्यू तक का सफर तय किया, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका। हालांकि, इस असफलता ने उन्हें निराश जरूर किया, लेकिन उनके इरादे नहीं बदले। उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और 70वीं बीपीएससी को दूसरे प्रयास के रूप में दिया। इस बार उनकी मेहनत रंग लाई और उनका अंतिम चयन ग्रामीण विकास पदाधिकारी (RDO/BDO) के पद पर हो गया।
‘यह सफलता मेरी मां की है’
अंजलि अपनी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपनी मां को देती हैं। उनका कहना है कि उनकी मां ऐसे परिवार और सामाजिक माहौल से आती हैं, जहां लड़कियों की कम उम्र में शादी कर देना सामान्य माना जाता है और उनकी पढ़ाई पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। इसके बावजूद उन्होंने समाज और परिवार के विरोध की परवाह किए बिना बेटी की शिक्षा को प्राथमिकता दी। अंजलि कहती हैं कि पिता के निधन के बाद उनकी मां ने बेहद कठिन समय देखा, लेकिन कभी उनकी पढ़ाई नहीं रुकने दी। आज वह अपनी इस सफलता को मां के संघर्ष और त्याग का परिणाम मानती हैं। उनके अनुसार, उनकी मां उनकी सबसे बड़ी ताकत हैं और वह हमेशा उनकी ताकत बनकर उनका सम्मान बढ़ाना चाहती हैं।












